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फिजाओं में रंजिश की बयार से हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं में रोष

कुछ मीडिया के बड़े घरानों ने जानबूझकर मामले को तूल दिया जबकि हकीकत कुछ और...

संगठन का मुखिया भी पड़ा कमजोर नहीं दिखाई अपनी दमदारी

✍🏻 ( कृष्णा पंडित की कलम से)...


वाराणसी: आखिर कोई कार्यकर्ता किसी संगठन से जुड़कर संगठन के लिए दिन रात मेहनत कर उसको एक मुकाम तक पहुंचाता है ! जिससे उसकी पहचान और संगठन का नाम बनता है वर्तमान के समय में फिजाओं में जो सनातनी लहर दौड़ रही है कहीं ना कहीं हिंदू संगठनों का बड़ा योगदान है देश में आज जो माहौल बना है उसे माहौल में खुशबू भी बिखरने वाले ऐसे ही छोटे-छोटे संगठन है जो दिन रात एक कर धर्म के प्रति अपनी निष्ठा और ईमानदारी जताते हुए लोगों की सेवा में जुटे रहे हिंदू युवा वाहिनी जिसके संरक्षक उत्तर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ हैं निश्चित तौर पर उनका ही चेहरा उनके ही आव/भाव और कार्य शैली लोग इस संगठन के कार्यकर्ताओं में देखने के लिए अशावान है !


देखते देखते कारवां बढ़ता गया और लोग जुड़ते गए संगठन ने भी अपनी पहचान बना ली सबसे बड़ी बात यदि कोई परेशानी या इस तरह के माहौल होता है जहां मुखिया और उसके बड़े नेता को आगे आकर अपने कार्यकर्ताओं का भरपूर साथ देना चाहिए जिससे उनके साथ अन्याय ना हो सके क्योंकि नया उम्र और नए लड़के जो जोश में कानून को कभी-कभी ताक पर रखकर कुछ ऐसी हरकतें कर देते हैं जिससे समाज को भी शर्मसार होना पड़ता है मुखिया को भी शर्मिंदा होना पड़ता है ! वाराणसी में पिछले दिनों गोदौलिया कांड जिसको इतना बड़ा चढ़कर मीडिया घराना ने दिखाया की जिसका कोई मतलब नहीं था ! एक नोक झोंक और बदसलूकी के मामले को 307 तक करार दे दिया गया जो कहीं से ठीक नहीं ! वर्तमान के समय में पूरे देश की नजर वाराणसी में घट रही घटनाओं के साथ-साथ यहां की फिजाओं पर होती है कि कितना बदलाव और क्या हो रहा है .? क्योंकि देश के प्रधानमंत्री वाराणसी का सांसद अर्थात अगुवा है जिसके होते हुए यदि युवाओं के साथ पुलिसिया अतिक्रमण होता है तो निश्चित तौर पर लोग नाराज और हतोत्साहित होंगे !


पूरी घटना का क्रम देखा जाए तो शुरुआत अपशब्दों का प्रयोग से होता है जहां हिंदू युवा वाहिनी के पदाधिकारी द्वारा दर्जनों की संख्या में उपस्थित होकर दरोगा के साथ बदजुबानी और बदसूलकी की गई यह सच है ! लेकिन यह भी कटु सत्य है की संगठन के पदाधिकारी कोई भी सामाजिक आपदा या लोगों की मदद के लिए निरंतर प्रयासरत्न रहे हैं हिंदुत्व को जागृत करने के लिए युवाओं ने एक हूंकार भरी है जिसकी आगाज और आवाज दूर-दूर तक जाती रही है !

विचारणीय है की मुकदमे के चार दिन तक अभी तक संगठन के कोई प्रमुख पदाधिकारी द्वारा या बड़े पद पर आसीन नेताओं ने भी कोई कमिटमेंट नहीं किया चुप्पी सादे हुए बैठे लोकतंत्र के रखवाले कहां गुम हो गए ! सत्य अहिंसा के पुजारी सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी बयान बाजी तय कर रहे हैं जबकि यह मामला बहुत ही आसानी से निपटाया जा सकता था ! प्रबुद्ध वर्गों द्वारा हस्तक्षेप और सच्ची घटना के क्रम के अनुसार मुकदमा का पंजीकृत कर दोषियों को सजा यही न्याय है  ! लेकिन राजनीति के इस कड़वे प्रदेश में सब कुछ जायज है जहां जीरो टॉलरेंस की बात होती है वहां रोज न्याय जमीन पर रेंगते हुए घुटने टेकता है बात यदि पुलिसिंग की हो तो हमने भी फिसलती हुई पुलिस को और नेताओं की इशारे पर कठपुतली की तरह दौड़ने वाली मशीन बन उठक बैठक लगाते हुए कई मामलों में देखा है!

प्रदेश के किसी भी बड़े नेताओं द्वारा इस मामले में दखल ना देना भी अकारण इस घटना को हवा देने जैसा है और तो और सबसे बड़ी बात जितने भी आप मुकदमे में लगाए गए जिसका साक्षी या चौराहे पर कई कैमरे बन सकते हैं कुछ वीडियो वायरल किया गया जिसके आधार पर मामला ने तूल पकड़ा ! वीडियो के आधार पर कई मीडिया घराना ने तो यहां तक लिख दिया कि माफियाओं से नजदीकी और बड़े अपराधी के तौर पर अपनी कलम में झुटी स्याही की पैमाइस कर नवयुवकों को पोस्टर बॉय के रूप में चेहरा चिन्हित कर सामाजिक रुतबा मान सम्मान पर आघात किया जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए पढ़े लिखे युवक यदि राजनीति में अवसर तलाशते हैं तो निश्चित तौर पर किसी पार्टी या संगठन से जुड़कर अपनी भरपूर कोशिश करते हैं अपनी पहचान बनाने के लिए यह गलत नहीं है इसके पहले यदि इनका जीवन की उतार चढ़ाव व कार्य शैली देखा जाए तो ना ही किसी मुकदमे में यह लंबित हैं ना आए किसी मुकदमे से इनका तालुकात है और ना ही किसी अपराध से तो फिर यह कहानी क्यों गढ़ी जा रही है क्या मीडिया आंख मूंद कर परोसे हुए थाली का भोजन सूंघकर करती है या पुष्टि के साथ पुष्ट जानकारी के बाद खबरों का संकलन होना चाहिए ! निश्चित तौर पर कहीं न कहीं कुछ लोग जिम्मेदार हैं चलिए आगे बढ़ते हुए बात करते हैं लोकतंत्र और जिम्मेदार हुक्मरान की जो निश्चित तौर पर अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए खानापूर्ति के लिए बदहोश दौड़ लगा रहे हैं अब देखना होगा कि एक ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया है और अन्य कई फरार हैं जबकि संगठन अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं जिस तरीके से यह मामला उछाला गया वह अनुचित और निराधार है यदि दरोगा के साथ बदसूलकी हुई तो दोषियों को सजा होनी चाहिए लेकिन जितना दोष उतनी सजा न की मनमानी तौर पर मुकदमे का गलत इस्तेमाल कर फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए !

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