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बकर कसाब बकरे के नाम पर बकरे के छोटे छोटे बच्चों का काट कर बेच रहे मीट



पूर्वांचल राज्य ब्यूरो, पीलीभीत  (शबलू खा)

पूरनपुर/पीलीभीत। निर्दयता आदमी के सिर चढ़ के बोल रही है आदमी पेट के लिए लिए इतना निर्दय बन चुका है की  अब उसे दया भी आनी बंद हो गई है। जिस तरह वर्षा काल में प्रजनन काल में जिस समय मछली का शिकार बंद होता है और मछली कच्ची मानी जाती है उस समय भी मछली का शिकार बंद नहीं करते है। जब की उस समय मछली का सेवन शरीर के लिए नुकसान दायक साबित होता है। उसी तरह बकरे का मीट बेचने वाले भी बकरे के छोटे छोटे बच्चे भी काटने से बाज नहीं आ रहे है। इस्लाम धर्म में भी कुर्बानी के लिए बकरे के लिए शर्त रखी गई है की बकरा एक साल से उम्र में कम ना हो और बड़ा जानवर दो वर्ष से कम ना हो। ताकि बकरा कम से कम एक वर्ष का जीवन तो व्यतीत कर ही ले। मगर बकरे का मीट बेचने वाले सस्ते के चक्कर में बकरा मालिक से शिशु बकरा ले लेते हैं। मालिक इसलिए शिशु बकरा बेच देते हैं ताकि बकरी का दूध बच जाए। उसी का फायदा उठाकर  शिशु बकरे को सस्ते में खरीद कर उसे काट कर बकरे के दाम में उसे छह सौ से लेकर सात सौ रुपया किलो तक बेचते है। ये मानवता विरुद्ध है शिशु बकरा दूध पीने के आयु में ही उस की जान चली जाती है। ये पशु क्रूरता की श्रेणी में आता है इसे तत्काल बंद होना चाहिए।

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